Sunday, 20 January 2013

अंतिम तारीख

मिश्रा जी,
सरपट दौड़े जा रहे हैं
पैर-हाथ एक दुसरे से
रेस लगा रहे हैआँखे सड़क पे गडाएबेतरतीब चले जा रहे हैसर पे जैसे कोई धून सवार है
बगल से अप्सरा गुजरतीया बदबू देती नाली-कालीइन्हें कोई सुध नहींबस कदम बढ़ा रहे हैसर पे जैसे कोई भूत सवार है
कल तक जो अपनी धोती कमीज पेछटास भर धुल नहीं पड़ने देते थेआज धुलिया गली मेंहोली मच रहे हैचेहरे पे रेखांये खिंची हैसर पे जैसे इनके मौत सवार है
नुक्कड़ पे पहुचे ही थेअचानक पीछे से किसी ने आवाज लगाईक्या बात हैराजधानी आज सड़क पे आई?
मिश्रा जी पीछे मुड़ेआँखे लाल, तनी भृकुटीचिल्ला कर बोलेमसखरी मत करोआज दिमाग नहीं ठीक हैदेर हो रही हैआज फारम भरने की अंतिम तारीख है.

अनमनी ज़िन्दगी


आज ज़िन्दगी को अपनी आँखों
के सामने गुजरते देखा 
कुछ मायूस लगी ज़िन्दगी 

रोती बिलखती नहीं पर 
संजीदगी से अपने गम को 
छुपाती और इशारो में
दर्द बयां करती ज़िन्दगी

अभी तक मैं रहा खुशफहमी में 
की मस्तमौला है अपनी ज़िन्दगी 
आज उदास सा लगता है 
देख यह बेतरतीब जिंदगी 

जाने किस रंग की आस 
कैसी मिठास 
किसके पास
जिसकी तलास में भटक रही है ज़िन्दगी

कुछ तो बता दो 
है अब किसका लिहाज 
की क्यों हो मायूस
ओ मेरी ज़िन्दगी?