Monday, 1 February 2016

मुहान

मुहान पर खड़ा मैं
निहारता
अनिगनत संभावनाओं को
तलाशता
अपनी मंजिल
उन राहो में
जिनसे अभी तक अन्जान हुँ ।

ये पथ 'अ' से है
मतलब 'आसान' होगा मंजिल पहुँचना ।
ये पथ 'ब' से है
मतलब 'बमुश्किल' पहुँचायेगा ।।

ये पथ 'क' से है, कठिन डगर होगा ।
ये पथ 'उ' से है, रास्ता उबड़ खाबड़ होगा ।

युँ बेमतलब के समीकरण
बुनता मैं दिमाग में,
जाने कब से खड़ा
हुँ इस उधेड़बुन में
मैं यहाँ मुहान पे

वो जो आज सफल हैं
वो जो आज महान हैं
इन्ही रास्तों से गये होंगे ना ?
कैसे चुना होगा उन्होने रास्ता अपना ?
रास्तों ने उन्हे मंजिल पहुँचाया
या उन्होने रास्तों को दिया मंजिल अपना ?

मैं चलुँ कोई इक
पथ पकड़
ढृतसंकल्प होकर ।
या इंतजार करुँ
इक सफल कहानी की
जो बताए मुझे
इधर चल, ये पथ पकड़
बेफिक्र होकर ।।

चलो आज इक रात और रूकता हुँ
सोचता हुँ, समझता हुँ
वो पथ निश्चय करने की
अंतिम कोशिश करता हुँ ।
गर ना मिले वो पथ जो
पहली किरण का पीछा लगायेंगे
फिर पथ जो भी हो
मंजिल वहीं बनायेंगे ।।