Monday, 6 June 2016

खंडहर

मेरे घर के 
बगल की गली में
एक आलीशान घर 
हुआ करता था,
स्कूल जाने के
रास्ते में पड़ता था,
दरवाजे पे दो बिलायती
लम्बे चौड़े कुत्ते
हर आने जाने वाले को
गुर्रा कर देखते थें
क्या ठाठ होगा इनका
सोचा करता था।
हमेशा कोई लम्बी
गाड़ी लगी रहती थी
रस्ते पे
और शाम को तो
कभी कभी यूँ
गाड़ियों का ताँता
लगा होता था
एंटीक गाड़ियों की
कोई शोरूम हो जैसे ,
गाड़ियों से उतरते लोगो
के बदन पे सिल्कीदार
चमकते कड़क कपड़े
अभी न्यू का टैग हटाया
हो ऐसा मालूम पड़ते थें।
जेहन में ये
सारे विचार उमड़ रहे थे
उस जगह को देखकर,
एकदम वीरान, धुत्त शांत
आधे कटे पेड़ सा बस
एकटक देखता हुआ
खंडहर रह गया था
कुछ कुत्ते आज भी आते थे
बची हुई दीवाल से
छाँह लेने
पर कभी ये उतना
आलिशान भव्य होगा
इसका अंदाजा लगाना
नामुमकिन सा था।
खुद मैं देख हैरान था,
सोचा शायद हर चीज की एक
उम्र होती है। 

Monday, 1 February 2016

मुहान

मुहान पर खड़ा मैं
निहारता
अनिगनत संभावनाओं को
तलाशता
अपनी मंजिल
उन राहो में
जिनसे अभी तक अन्जान हुँ ।

ये पथ 'अ' से है
मतलब 'आसान' होगा मंजिल पहुँचना ।
ये पथ 'ब' से है
मतलब 'बमुश्किल' पहुँचायेगा ।।

ये पथ 'क' से है, कठिन डगर होगा ।
ये पथ 'उ' से है, रास्ता उबड़ खाबड़ होगा ।

युँ बेमतलब के समीकरण
बुनता मैं दिमाग में,
जाने कब से खड़ा
हुँ इस उधेड़बुन में
मैं यहाँ मुहान पे

वो जो आज सफल हैं
वो जो आज महान हैं
इन्ही रास्तों से गये होंगे ना ?
कैसे चुना होगा उन्होने रास्ता अपना ?
रास्तों ने उन्हे मंजिल पहुँचाया
या उन्होने रास्तों को दिया मंजिल अपना ?

मैं चलुँ कोई इक
पथ पकड़
ढृतसंकल्प होकर ।
या इंतजार करुँ
इक सफल कहानी की
जो बताए मुझे
इधर चल, ये पथ पकड़
बेफिक्र होकर ।।

चलो आज इक रात और रूकता हुँ
सोचता हुँ, समझता हुँ
वो पथ निश्चय करने की
अंतिम कोशिश करता हुँ ।
गर ना मिले वो पथ जो
पहली किरण का पीछा लगायेंगे
फिर पथ जो भी हो
मंजिल वहीं बनायेंगे ।।