Thursday, 22 May 2014

डर




हैरानी होती है
हम खुद को भी
नहीं जानते, 
रोज नयी बात
सिखनेको मिलती है
अपने ही बारे में।
जैसे पन्ने पलट रहे हों
किसी जासूसी किताब के,
अभी एक पन्ने पे जैसे
ही लगता है की,
सारी गुत्थी सुलझ गयी,
सारे जवाब मिल गए,
अगला पन्ना फिर
चौंकाता है ,
कुछ नए राज दिखाता है।
हमें दिखता है हम कितने गलत थें,
गुत्थियाँ को गलत छोर
से खिंच रहे थे,
जिन्हे जवाब समझा था
वही नए सवाल बिन रहे थे ।
आज डर का पन्ना था
खुद की उस किताब में,
बेवजह बिना सिर पैर का डर,
डर उस बात का
जिसे कब का भूल चुके थें,
जिसके पन्ने भी फाड़ चुके थे,
बचपन की किताब में ।
पर शायद डर भुलाया नहीं जाता
डर छुप जाता है, बैठ जाता है
किसी अँधेरी सुराख़ में
फिर से हमें डराने के लिए
हमारे इन्तेजार में।

Thursday, 1 May 2014

An open Love letter!


I love you.
मुझे नहीं पता,
तुम कौन हो ?
कहाँ रहती हो ?
तुम्हारी आवाज़ कैसी है ?
कोयल गोरैये या शेरनी जैसी है ?

पर हाँ इतना पता है कि
तुम्हारे प्यार मे बेवड़ा
होने के कगार पे हूँ,
यार! कविताये लिखने लगा हूँ,
वो चाँद सितारों नदियों बहारों वाले।
तू चाँद मैं सितारा,
तू दरिया मैं किनारा,
तेरे पास आने को तड़प रहा,
ये आशिक आवारा वैगेरह वैगेरह।।

लोग  कहते हैं न कि
भावनाओं  को शब्दों में
बयां नहीं किया जा सकता,
सही कहते हैं,
सागरों को चापाकलों
में नहीं समेटा जा सकता,
फिर भी,
लोटा बाल्टी भर
जितनी भी भावनाएं
उढ़ेल सकूँ शब्दों में,
बिद्या कसम उससे पाँच  गुना
ज्यादा कोशिश कर रहा हूँ।
बस एक बार तुम कोशिश
करो लोटे मे समंदर की
परछाई देखने कि,
तुम भी रूबरू हो जाओगी
मेरी इंतहा-ए-मोहब्बत से।।

गर फ़िर भी तुम्हे,
मेरे प्यार का
एहसास नहीं होता,
मेरे दर्द का
आभास नहीं होता,
तो कोई नहीं, बस
एक मरहम अदा कर देना,
अपनी किसी सहेली
का मोबाइल नंबर हि दे देना।

तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा
-आशिक आवारा

नोट : मिश्राजी कसम से ये आपकी बेटी के  लिये नहीं  लिखा।