Thursday, 22 May 2014

डर




हैरानी होती है
हम खुद को भी
नहीं जानते, 
रोज नयी बात
सिखनेको मिलती है
अपने ही बारे में।
जैसे पन्ने पलट रहे हों
किसी जासूसी किताब के,
अभी एक पन्ने पे जैसे
ही लगता है की,
सारी गुत्थी सुलझ गयी,
सारे जवाब मिल गए,
अगला पन्ना फिर
चौंकाता है ,
कुछ नए राज दिखाता है।
हमें दिखता है हम कितने गलत थें,
गुत्थियाँ को गलत छोर
से खिंच रहे थे,
जिन्हे जवाब समझा था
वही नए सवाल बिन रहे थे ।
आज डर का पन्ना था
खुद की उस किताब में,
बेवजह बिना सिर पैर का डर,
डर उस बात का
जिसे कब का भूल चुके थें,
जिसके पन्ने भी फाड़ चुके थे,
बचपन की किताब में ।
पर शायद डर भुलाया नहीं जाता
डर छुप जाता है, बैठ जाता है
किसी अँधेरी सुराख़ में
फिर से हमें डराने के लिए
हमारे इन्तेजार में।

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