Monday, 15 July 2013

विकास

तुम्हारे पास खाने को कुछ नहीं
भूखे हो?
रहने को घर नहीं
बेघर हो?
पढ़ा कभी नहीं
अनपढ़ अशिक्षित हो?
पता है तुम्हारी समस्या क्या है?
तुम आलसी हो,
बेवक़ूफ़ हो,
गधे हो,
समझते हो सरकार खाने को देगी
रहने को घर देगी, तुम्हे पढ़ाएगी?

अरे बेवकूफ़
अख़बार देखो, न्यूज़ देखो।
सरकार पे बड़ी बड़ी
मुसीबतें आन पढ़ी है,
हमारी अर्थव्यवस्था अभी
ख़राब दौर से गुजर रही है,
जीडीपी घट गया है,
नेट प्रॉफिट कम हो रही है,
ऊपर से ये महंगाई,
और तुम्हे सबकुछ
मुफ्त चाहिए?
फूटपाथ पे रहो, भूखे मरो
आलसी कहीं के।
हाँ तुम जो कोने में हो तुम भी सुनो
माना की तुम विकलांग हो
चल फिर नहीं सकते
पर इसमें हमारी क्या गलती है
यह तो तुम्हारी किस्मत है
जिन्दा रहो या मरो।

सरकार को जीडीपी बढ़ाने दो
नयी इंडस्ट्रीज लगाने दो
तुम्हे अभी कोई फायदा नहीं दिख रहा
पर भरोसा रखो
दसियों साल बाद जब तुम ये दिन
याद करोगे
तो कहोगे
की सरकार ने अच्छा किया
जो हमे खाने को नहीं दिया!
क्या हुआ हम भूखे मरे तो!
आज हमारा देश तो विकसित हो गया!!

Thursday, 11 July 2013

पुचकार

अगर
मुश्किलें आती दरवाजे पर
देती दस्तक
बुलाती पूछती
आ जाऊं?

क्या करते लोग
बुलाते खोल बाहें,
बिठाते घर में उसे
अतिथि समझकर
या बहाने टाल देते
कभी और आना
अभी व्यस्त हूँ कहकर

क्या करता मैं
मुश्किलों को प्यार देता
की वो खुद को भूल
हमारे रंग में रंग जाती
हंसती खेलती
घर का हिस्सा बन जाती
या
दुतकारता उसे
कहता मेरा ही घर मिला था
मैंने ऐसा क्या किया था
खीझता, गुस्सा दिलाता
उसे रोकता तब तक
जब तक वो खुद विकराल बन
दरवाजा तोड़ ना आ जाती
मैं फिर सहमा खड़ा उसे पुचकारता
कहता तुम्हारा स्वागत है।




















Saturday, 6 July 2013

प्रासंगिक महाभारत

महाभारत की प्रासंगिकता
देखते बनती है
पिता अर्जुन की तरह
गर्भ में ही अभिमन्यु को
कोचिंग दिला रहे हैं

पुत्र तुम उठो, योद्धा बनो
जिंदगी आसान नहीं
चक्रव्यूह है
तोडना सिख रहे हैं

नजर जिधर भी घुमती है
उधर देखता हूँ
नन्हे कंधे, भारी तरकशो से लैश
गुरुकुल में जंग
की तयारी को जा रहे हैं 

दुधिया रौशनी

दुधिया रोशनी में
छनकर
हर चीज सुहानी हो जाती है
फिर वो बस्ती हो
झोपड़े हो
या गगनचुम्बी इमारत
ढलती उम्र के बूढ़े हो
तरफाराते, उतावले पंख फ़ैलाने को नवजवान
या हैरत-भरी आँखों से
दुनिया देख रहा कोई शिशु नवजात

दुधिया रौशनी जब
सफ़ेद बाँहे फैला
उन्हें अपने आगोश में लेता है
हर आँखे सजल, चेहरा निर्मल
मुख से ओज
छनछन कर टपकता है

होली खेलते वक़्त
दीवाल पे लगा रंगों का दाग
किसी कलाकार की
उधृत कृति लगती है
यु बेढंग, बेतरतीब से
पड़े हुए घर के सामान
कुछ बिस्तरों पे
कुछ कोने में रखी आलमारी पे
सभी माँ के हाथो
करीने से अपनी जगह
रखी  मालूम पड़ती है

मेज पर रखी
माशूक की तस्वीर
चमकती है कहर ढाती है
जिन्दा हूँ मैं
अहसास दिलाती है
दुधिया रौशनी में।