दुधिया रोशनी में
छनकर
हर चीज सुहानी हो जाती है
फिर वो बस्ती हो
झोपड़े हो
या गगनचुम्बी इमारत
ढलती उम्र के बूढ़े हो
तरफाराते, उतावले पंख फ़ैलाने को नवजवान
या हैरत-भरी आँखों से
दुनिया देख रहा कोई शिशु नवजात
दुधिया रौशनी जब
सफ़ेद बाँहे फैला
उन्हें अपने आगोश में लेता है
हर आँखे सजल, चेहरा निर्मल
मुख से ओज
छनछन कर टपकता है
होली खेलते वक़्त
दीवाल पे लगा रंगों का दाग
किसी कलाकार की
उधृत कृति लगती है
यु बेढंग, बेतरतीब से
पड़े हुए घर के सामान
कुछ बिस्तरों पे
कुछ कोने में रखी आलमारी पे
सभी माँ के हाथो
करीने से अपनी जगह
रखी मालूम पड़ती है
मेज पर रखी
माशूक की तस्वीर
चमकती है कहर ढाती है
जिन्दा हूँ मैं
अहसास दिलाती है
दुधिया रौशनी में।
छनकर
हर चीज सुहानी हो जाती है
फिर वो बस्ती हो
झोपड़े हो
या गगनचुम्बी इमारत
ढलती उम्र के बूढ़े हो
तरफाराते, उतावले पंख फ़ैलाने को नवजवान
या हैरत-भरी आँखों से
दुनिया देख रहा कोई शिशु नवजात
दुधिया रौशनी जब
सफ़ेद बाँहे फैला
उन्हें अपने आगोश में लेता है
हर आँखे सजल, चेहरा निर्मल
मुख से ओज
छनछन कर टपकता है
होली खेलते वक़्त
दीवाल पे लगा रंगों का दाग
किसी कलाकार की
उधृत कृति लगती है
यु बेढंग, बेतरतीब से
पड़े हुए घर के सामान
कुछ बिस्तरों पे
कुछ कोने में रखी आलमारी पे
सभी माँ के हाथो
करीने से अपनी जगह
रखी मालूम पड़ती है
मेज पर रखी
माशूक की तस्वीर
चमकती है कहर ढाती है
जिन्दा हूँ मैं
अहसास दिलाती है
दुधिया रौशनी में।
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