Saturday, 6 July 2013

दुधिया रौशनी

दुधिया रोशनी में
छनकर
हर चीज सुहानी हो जाती है
फिर वो बस्ती हो
झोपड़े हो
या गगनचुम्बी इमारत
ढलती उम्र के बूढ़े हो
तरफाराते, उतावले पंख फ़ैलाने को नवजवान
या हैरत-भरी आँखों से
दुनिया देख रहा कोई शिशु नवजात

दुधिया रौशनी जब
सफ़ेद बाँहे फैला
उन्हें अपने आगोश में लेता है
हर आँखे सजल, चेहरा निर्मल
मुख से ओज
छनछन कर टपकता है

होली खेलते वक़्त
दीवाल पे लगा रंगों का दाग
किसी कलाकार की
उधृत कृति लगती है
यु बेढंग, बेतरतीब से
पड़े हुए घर के सामान
कुछ बिस्तरों पे
कुछ कोने में रखी आलमारी पे
सभी माँ के हाथो
करीने से अपनी जगह
रखी  मालूम पड़ती है

मेज पर रखी
माशूक की तस्वीर
चमकती है कहर ढाती है
जिन्दा हूँ मैं
अहसास दिलाती है
दुधिया रौशनी में।



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