Thursday, 11 July 2013

पुचकार

अगर
मुश्किलें आती दरवाजे पर
देती दस्तक
बुलाती पूछती
आ जाऊं?

क्या करते लोग
बुलाते खोल बाहें,
बिठाते घर में उसे
अतिथि समझकर
या बहाने टाल देते
कभी और आना
अभी व्यस्त हूँ कहकर

क्या करता मैं
मुश्किलों को प्यार देता
की वो खुद को भूल
हमारे रंग में रंग जाती
हंसती खेलती
घर का हिस्सा बन जाती
या
दुतकारता उसे
कहता मेरा ही घर मिला था
मैंने ऐसा क्या किया था
खीझता, गुस्सा दिलाता
उसे रोकता तब तक
जब तक वो खुद विकराल बन
दरवाजा तोड़ ना आ जाती
मैं फिर सहमा खड़ा उसे पुचकारता
कहता तुम्हारा स्वागत है।




















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