Thursday, 20 July 2017

तारे टिमटिमाते हैं
या झपकाते हैं पलक
शायद उनसे अब पृथ्वी
और न देखी जाती होगी


एक ही काम है उनका, चमकना
फिर भी टिमटिमाते हैं
चेष्टा करते हैं
जबरदस्ती करते हैं
आँखे मुंदने को
इतनी ऐंठन क्युं?


हम भी तो रोज
देखते हैं, पढ़ते हैं
नृशंस खबरें बड़े चाव से
आँखे नहीं चुराते,


आँखे चोर चुराते हैं
कमजोर चुराते हैं
मजबूत बनो तुम
हालात नहीं बदलने वाले
सो बस देखो, सुनो और बढ़ें चलो
हमारी तरह

बड़े बैरक की तलाश



पहली बार जेल में
कैदी ज्यों ही खोलता है आँखे
उसे घुटन होती है बैरक में
छोटा सा पुराना बदबूदार बैरक
पसीने,पीक और पेशाब की ऐसी प्रगाढ़ता
मानो संगम हो इलाहाबाद का

उसपे भीड़, भीड़ कैदियों की
कपड़ो की
कंबलों की
चप्पलों की
बेतरतीब से फेंके हुए
पैर के ऊपर पैर
हाथ के ऊपर हाथ
बिलकुल 'मोहनजोदड़ो' लगती है बैरक

आँखे दिवालो में सुराख़ करना चाहती है
पैर सलाखें तोड़ दौड़ना चाहती हैं
और नाक खोद देना चाहती जमीं
सोंधी सी खुसबू को

बस
पहले कुछ दिनों तक।

फिर
सिपाही से दोस्ती
जेल राइटर से पहचान
साथी कैदियों से सम्मान
और आदत हो जाती  है जेल की

हाँ पर मन में अभी भी
एक टीस एक ख़लिश रहती है
बड़े बैरक  की
जहाँ इतनी भीड़ न हो
जहाँ इतनी गन्दगी न हो
जहाँ जेल इतनी जेल न हो

हाँ पर अब जेल बुरी  नही लगती।