Thursday, 20 July 2017

तारे टिमटिमाते हैं
या झपकाते हैं पलक
शायद उनसे अब पृथ्वी
और न देखी जाती होगी


एक ही काम है उनका, चमकना
फिर भी टिमटिमाते हैं
चेष्टा करते हैं
जबरदस्ती करते हैं
आँखे मुंदने को
इतनी ऐंठन क्युं?


हम भी तो रोज
देखते हैं, पढ़ते हैं
नृशंस खबरें बड़े चाव से
आँखे नहीं चुराते,


आँखे चोर चुराते हैं
कमजोर चुराते हैं
मजबूत बनो तुम
हालात नहीं बदलने वाले
सो बस देखो, सुनो और बढ़ें चलो
हमारी तरह

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