Monday, 15 July 2013

विकास

तुम्हारे पास खाने को कुछ नहीं
भूखे हो?
रहने को घर नहीं
बेघर हो?
पढ़ा कभी नहीं
अनपढ़ अशिक्षित हो?
पता है तुम्हारी समस्या क्या है?
तुम आलसी हो,
बेवक़ूफ़ हो,
गधे हो,
समझते हो सरकार खाने को देगी
रहने को घर देगी, तुम्हे पढ़ाएगी?

अरे बेवकूफ़
अख़बार देखो, न्यूज़ देखो।
सरकार पे बड़ी बड़ी
मुसीबतें आन पढ़ी है,
हमारी अर्थव्यवस्था अभी
ख़राब दौर से गुजर रही है,
जीडीपी घट गया है,
नेट प्रॉफिट कम हो रही है,
ऊपर से ये महंगाई,
और तुम्हे सबकुछ
मुफ्त चाहिए?
फूटपाथ पे रहो, भूखे मरो
आलसी कहीं के।
हाँ तुम जो कोने में हो तुम भी सुनो
माना की तुम विकलांग हो
चल फिर नहीं सकते
पर इसमें हमारी क्या गलती है
यह तो तुम्हारी किस्मत है
जिन्दा रहो या मरो।

सरकार को जीडीपी बढ़ाने दो
नयी इंडस्ट्रीज लगाने दो
तुम्हे अभी कोई फायदा नहीं दिख रहा
पर भरोसा रखो
दसियों साल बाद जब तुम ये दिन
याद करोगे
तो कहोगे
की सरकार ने अच्छा किया
जो हमे खाने को नहीं दिया!
क्या हुआ हम भूखे मरे तो!
आज हमारा देश तो विकसित हो गया!!

Thursday, 11 July 2013

पुचकार

अगर
मुश्किलें आती दरवाजे पर
देती दस्तक
बुलाती पूछती
आ जाऊं?

क्या करते लोग
बुलाते खोल बाहें,
बिठाते घर में उसे
अतिथि समझकर
या बहाने टाल देते
कभी और आना
अभी व्यस्त हूँ कहकर

क्या करता मैं
मुश्किलों को प्यार देता
की वो खुद को भूल
हमारे रंग में रंग जाती
हंसती खेलती
घर का हिस्सा बन जाती
या
दुतकारता उसे
कहता मेरा ही घर मिला था
मैंने ऐसा क्या किया था
खीझता, गुस्सा दिलाता
उसे रोकता तब तक
जब तक वो खुद विकराल बन
दरवाजा तोड़ ना आ जाती
मैं फिर सहमा खड़ा उसे पुचकारता
कहता तुम्हारा स्वागत है।




















Saturday, 6 July 2013

प्रासंगिक महाभारत

महाभारत की प्रासंगिकता
देखते बनती है
पिता अर्जुन की तरह
गर्भ में ही अभिमन्यु को
कोचिंग दिला रहे हैं

पुत्र तुम उठो, योद्धा बनो
जिंदगी आसान नहीं
चक्रव्यूह है
तोडना सिख रहे हैं

नजर जिधर भी घुमती है
उधर देखता हूँ
नन्हे कंधे, भारी तरकशो से लैश
गुरुकुल में जंग
की तयारी को जा रहे हैं 

दुधिया रौशनी

दुधिया रोशनी में
छनकर
हर चीज सुहानी हो जाती है
फिर वो बस्ती हो
झोपड़े हो
या गगनचुम्बी इमारत
ढलती उम्र के बूढ़े हो
तरफाराते, उतावले पंख फ़ैलाने को नवजवान
या हैरत-भरी आँखों से
दुनिया देख रहा कोई शिशु नवजात

दुधिया रौशनी जब
सफ़ेद बाँहे फैला
उन्हें अपने आगोश में लेता है
हर आँखे सजल, चेहरा निर्मल
मुख से ओज
छनछन कर टपकता है

होली खेलते वक़्त
दीवाल पे लगा रंगों का दाग
किसी कलाकार की
उधृत कृति लगती है
यु बेढंग, बेतरतीब से
पड़े हुए घर के सामान
कुछ बिस्तरों पे
कुछ कोने में रखी आलमारी पे
सभी माँ के हाथो
करीने से अपनी जगह
रखी  मालूम पड़ती है

मेज पर रखी
माशूक की तस्वीर
चमकती है कहर ढाती है
जिन्दा हूँ मैं
अहसास दिलाती है
दुधिया रौशनी में।



Sunday, 23 June 2013

उन दोनों की लड़ाई

छोटी छोटी बातों   पे
यूँ बेमतलब का लड़ना 
रुसना, गुस्सा होना 
मुँह फुलाना 
नाक सिकोड़ना
चुटकी लेना 
फिर बातें बनाना 
माफ़ी मांगना 
गुदगुदाना, हँसना 
हँसाना 
साथ बैठ  घंटो कहानियाँ बाचना 
फिर कोई दुखड़ा सुनाना 
चुटकी लेना 
गुस्सा होना 
ये सिलसिला  चलता रहता है 
दोनों झगड़ते है 
एक दुसरे को मनाने के लिए 








उत्तराखंड से

हर जान की कीमत लगी
है इस दुकान में 
जिन्दा लोगो को भुना  
जाता है हमारे मकान में 

जो जितना गरीब मजबूर है 
उतना ही वो लजीज है 
रोटियों को उनके लाश पे 
पकाकर तो देखो 
आप एक बार आओ 
खाकर तो देखो 
नही स्वाद ऐसा किसी पकवान में

वैसे खाने से भी
ज्यादा मजा पकाने में है
एक एक बोटी को काटकर
तेल गर्म करते हैं
नमक मसाला मिलाकर जब छानते हैं
गर्म तेल में बोटी जो बुलबुले बनाता है
नजारा देख दिल को सुकून आता है
लगता है की
गर जन्नत कहीं है तो बस यहीं है

 -उत्तराखंड से

   

इंसानियत

इंसानों की इंसानियत देख
जानवर भी कहते होंगे
की अच्छा है की हम इंसान नहीं


Sunday, 16 June 2013

मेरी इंसानियत

वर्षो बाद दिखा आज
मैं तो उसे भूल भी चूका था
पता नहीं कैसे मिल गया आज

कपड़े  फटे थे
शरीर झुलसा हुआ
चेहरा झुर्रियो से लदा था
जीर्ण बिस्तर बिछाये
सड़क पे वो लेटा पड़ा था

बड़ी मुश्किल से पहचान पाया
उठाया उसे घर लाया
वो मेरी इंसानियत थी।



Thursday, 13 June 2013

कोरी दया जब तक भीख में दी जाएगी 
इंसानियत अपाहिज ही नजर आएगी 

यहाँ सभी कहते हैं दिल साफ़ है मेरा 
पर नियत किसी से दिखाई नहीं जाएगी 

गलियाँ तो सभी साफ़ देखना चाहते हैं 
पर झाड़ू किसी से नहीं उठाई जाएगी 

सिनेमा में खूब सीटियाँ तालियाँ बजेगी
ऐसे कभी हीरो के लिए आवाज नहीं आएगी 

जब तलक हलक से स्वर क्रांति फूटता नहीं 
हुक्मरानों को जम्हूरियत बेगम ही नजर आएगी 


Wednesday, 12 June 2013

पहली मुलाक़ात


हम अजनबी ही
तो थे कुछ दिन पहले
यूँ ही मिले  थे टहलते
हुए रास्तो पे
तुम्हे याद है ना?

तुमने वो रंग-बिरंगी
इन्द्रधनुषी मुस्कराहट
पहनी थी
मैं पक्की सड़क चेहरे
पे पहन जा रहा था
तुमने टोका था
तुम्हे याद है ना?

मैं कैसे आँधियों में
खड़े पेड़ सा
अनिश्चित
अपने भाग्य पे
इतरा रहा था
तुम्हे याद है ना?

कुछ ही दिन तो हुए हैं
पर कितनी पुरानी
बात लगती है
बहुत आगे निकल चुके हम
पर आज जब  मुहाने पे खड़े हैं
तब मैं एक बार फिर तुमसे
पहली बार मिलना चाहता हूँ


अलग इतिहास

बड़ी तमन्ना है मेरी
की अजूबा बनूँ, कुछ अलग करूँ।
अचानक दिमाग में आया
क्यूँ न अलग इतिहास लिखूँ
सही को गलत, झूठ को सच
मनगढ़ंत कहानियाँ बेबाक लिखूँ

बीरबल को बेवकूफ
अकबर को अक्लमंद
तानसेन को बेसुरा
मान-सिंह को दरबान लिखूँ

तथ्यों को मरोड़ दूँ
कुछ इधर से उधार
कुछ उधर से उधार
ले बस कहानियाँ जोड़ दूँ

सच का मुखौटा पहना
झूठ को पुरजोर लिखूँ
बड़ी तमन्ना हुई मेरी
की मैं अलग इतिहास लिखूँ

पर फिर  नजर मेज पे रखी
इतिहास की पुस्तको पे पड़ी
सच हैं कहा इनमे
सच का अल्पांश लिखा है
तंग हाथों से सबने
बस अपना अभिप्राय लिखा है
सच का चोला ओढ़ाकर
झूठ बेहिसाब लिखा है

अलग बनने की होड़ में
कहाँ बाज़ार में आ गया
आजकल फिर से बैठा सोच रहा हूँ
क्या करूँ क्या करूँ






Tuesday, 4 June 2013

Big Bang

शायद कहीं कुछ Big Bang सा हुआ है
सिद्धांतो का Democratic विचारो का
क्यूंकि एक  नया ही Universe जन्मा है
यहाँ Matters का नहीं
विचारो का  जोर है
बुनियादी हक़, पूर्ण स्वतंत्रता चाहिए
हर तरफ यही शोर है

ये Universe थोडा अलग है
यहाँ की Gravity  है Humanity
Dark Matters की
जगह Computers हैं
और इन्टरनेट है Dark Energy

Tunisia में Nebula दिख रहा
तो Turkey में Supernova
बन रहा, मिट रहा
है मिट के बन रहा

यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं
हर विचार गतिशील है
शायद कहीं कुछ Big Bang सा हुआ है









Thursday, 30 May 2013

कागजो का आकलन

चंद कागज के टुकड़े
कुछ अंक जैसे है
जिनमे छपे हुए
सालो पुरानी पद्धति
जिनके आकलन की
वो क्या खाक तुम्हारे
भविष्य का निर्माण-पतन करेंगे
जिनके प्रासंगिकता पे
खुद लाखो सवाल हैं उठते

ये अंक, आकलन की नहीं
बस प्रतिष्ठा की बानगी है
दिखाने के काम आती हैं
और किसी काम की नहीं है

हाँ यह रद्दी भी नहीं हैं, पर फिर भी

कागज हैं, इन्हें कागज ही रहने दो
जिंदगी न बनाओ
किसी को इन चंद कागजो में
समेटा नहीं जा सकता
खुद को इनका गुलाम न बनाओ।।




Friday, 24 May 2013

मौसम

भरी दुपहरी में
नंगे बदन
पसीने में तरबतर
दो जून की रोटी की
खातिर मजूरी करते
मजदुर से पूछो
की मौसम कैसा है
दावा करता हूँ
की वो हतप्रभ
एकटक देखते हुए
तुम्हे इतना ही कह पायेगा
की दो जून की रोटी
नसीब है आज
भूख की अट्टाहस
नही गूँजेगी आज
सो मौसम अच्छा है



Monday, 13 May 2013

तस्वीरे

तस्वीरे क्या हैं?
कहने को एक प्रति
कैमरे से खिंची हुई
पर गर सोचें तो 
तस्वीरे हैं

जिंदगी के रंग-बिरंगी
यादों की
जीवंत परछाईयाँ

जितनी पुरानी
गढ़ती उतनी कहानी
दिन ब दिन इसे चढ़ती जवानी
जैसे पुरानी शराब

कुछ खट्ठी कुछ मीठी
माँ के हाथों की
गुड्म्मा सरीखी
चटपटी यादों की गुल्लक

जब कभी नीरस लगे
तो गुदगुदाती है
समय-असमय तस्वीरे
भी हमें जीना सीखा जाती हैं। 

Monday, 22 April 2013

तुम्हारी यादें

तुम समय-असमय
अनायास
आज भी याद आते हो
मुझे खींचते हो अपनी तरफ
किसी और ही
दुनिया में ले जाते हो

जहाँ सही गलत
कुछ नहीं
जहाँ झूठ सच का
ढोंग नहीं
जहाँ दगा नहीं
दर्द नहीं
बस मैं और तुम्हारी चटपटी यादें

कहानियाँ बुनता
किरदार गढ़ता
मैं खेलता घंटो
उनके साथ
जैसे यादें, यादें न हों 
कहानी हो रंगमंच की 
जहाँ मैं ही निर्देशक 
मैं ही कलाकार 

हर बार एक नया 
अंत लिखता
खुद को समझाता 
खुद समझता

तुम्हारी तरह 
तुम्हारी यादें भी 
एक अजीब पहली 
बन गयी हैं
पता नहीं क्या चाहती हैं 
न हंसने देती हैं न रोने 
हाँ कभी कभी हौले से गुदगुदा जाती हैं 
बिलकुल तुम्हारी तरह 



Sunday, 14 April 2013

माफ़ीनामा

अरविन्द
बहुत धोखे खाये  हैं
हमने इन चंद वर्षो के
इतिहास में
इज्जत करता हूँ तुम्हारी
पर क्या करूँ भरोसा
नहीं होता अब किसी पे
होशो-हवास में।।

तुम्हे निराश नहीं
करना चाहता
पर अभी हमसे
कुछ भी अपेक्षा करना
बेईमानी होगी  
अभी  कुछ दूर तुम्हे
ना सिर्फ अकेले चलना है
इन पथरीली रास्तो पे
कँटीली झाड़ियो से होकर
बल्कि हमारे लिए एक
सहज सुगम
सड़क भी बनानी होगी
अगुआ नहीं बना सकते
तुम्हे बस अच्छाई के कयास में
भरोसा नहीं होता अब किसी पे
होशो-हवास में।।

तुम्हे इंतेजार करना होगा
नहीं जानता कितने दिन
अंगुलियों पे मैंने घंटे गिनना
छोड़ दिया
फ़क़त इतना कह सकता हु
तेरे साथ नहीं
तो तेरे खिलाफ भी नहीं
पर अभी तेरे साथ नहीं खड़ा
हो सकता तेरे आवास में
भरोसा नहीं होता है अब किसी पे
होशो-हवास  में।









Friday, 12 April 2013

बाघा के देशभक्त

देशभक्ति उबाल मारता है
बाघा बॉर्डर पे, 
वहाँ हर रोज 
14, 15 अगस्त का 
माहौल होता है। 
खून में गर्मी 
गले में आवाज 
आवाज में तल्खी 
हौसले बुलंद 
मुर्दे में भी जान फूंक दे 
ऐसा कलोल होता है।
सारे देशभक्त मिलेंगे 
आपको वहां
हर बच्चा बूढ़ा 
युवा दिखता  है यहाँ 
देशभक्ति की पराकाष्ठा 
की परिभाषा 
हर रोज गढ़ी जाती है 
बच्चा बच्चा जिंदाबाद 
के जयघोष करता है 
क्षण भर को सब कोई 
खुद को भगत और बोस  समझता है

सही कहते हैं वो लोग
घृणा से बड़ा कोई प्रेरक नहीं
बाघा गवाह है की हमे नफ़रत
की जरूरत है
हम प्यार के काबिल नहीं

अपने देश में लाख बुराई  है
गरीबी है, भ्रष्टाचार है
नैतिकता नहीं देह व्यापार है
पर किसे फिक्र
हम तो बस खुश है इस बात से
की पडोसी की होती जगहंसाई है।

शर्म और हंसी आती है
ऐसे देशभक्तों पर
जो बस जयघोष कर
कर्तव्य निर्वाह करते हैं
कुछ खास फर्क नहीं ऐसे लोग
और राजनेताओ में
दोनों अपने स्वार्थ की खातिर
देशभक्ति का माखौल  करते हैं।











Thursday, 11 April 2013

विडंबना

भारतीय राजनीती की 
विडंबना देखते बनती है 
यहाँ कहने को दो पक्ष हैं 
अलग विचार है अलग सोच है 
पर हकीकत में ये सब प्रपंच हैं 

उदहारणतः 
भारतीय राजनीती के दो 
अहम् चेहरे 
पप्पू और फेंकू 
साहब फर्क इनमे 
खास नहीं दिखता 
गर एक अम्बानी का तो दूसरा 
टाटा का है चमचा 

खैर पप्पू से ये  अपेक्षित है 
वो बस पारिवारिक 
जिम्मेदारी निर्वाह रहे है 
इसलिए कॉरपोरेट के 
पैर दबा रहे हैं 

पर फेंकू तो सोशलिस्ट बने फिरते हैं 
बराबरी और सम्पूर्ण विकाश की 
बाते करते रहते हैं 
फिर गरीबो के तरफ उनका 
ध्यान क्यूँ नहीं जाता 
क्यूँ कॉरपोरेट के पिछलग्गू बन 
उनकी तरफदारी करते हैं 
नए रोजगारों  के बजाए 
नए अरबपति बनाने की 
योजना बुनते रहते हैं

चलो फिर भी हम क्या कर सकते हैं 
पप्पू देश के युवराज हैं 
तो फेंकू एक मात्र भविष्य 
बस एक कहावत याद आता है 
की खाई में गिरो या कुंवे में 
मौत  है अवश्य।।



Monday, 8 April 2013

सपने

मुझे हमेशा रही है
ऐसे यन्त्र की कल्पना
जिससे कर सकू रिकॉर्ड
अपना हर एक सपना

अभी लगता है जैसे
जिंदगी का
एक हिस्सा
कोई खास किस्सा
मुझसे अनजान है

सपना अधीर करता है
अमीर करता है
गरीब करता है
हँसता है  रोता है
कभी कभी जलील करता है

सपने में वो
दो तिन मंजिले फांद  जाना
सितारों के साथ
चाँद पे बैठ खाना खाना
मौत के डर  से वो
गाड़ियों  से भी तेज भाग जाना
उसके लिए कुछ कविताये लिखना
और सबको सुनाना
पापा को पॉलिटिक्स समझाना
तो कभी बिलकुल असहाय
मुश्किल से रेंग पाना

सुबह जब नींद
उन सपनो की
धुंधलाई-छितराई  यादो
के साथ खुलती है
थोड़ा  अनमना लगता है
सपनो की उन कहानियो
को पूरा करने की
इक  बैचैनी होती है
सपनो को यादो की तरह
सहेज कर रखने की तमन्ना
हर सुबह दुनी होती है।


Life in MS-Excel Style

काश जिंदगी के कामों
का भी एक Record  होता
Mistakes को Manually
Find  कर Correct करते
या फिर Filter का ही
कोई Option  होता
Find  all  and  Replace  है easy
काश editing  का Macro  बना होता

भई Pivot Table  में Customize
कर Problems  Specifically देखते
और Lost Data Easily Recover होता
काश जिंदगी के कामो का भी
एक Record होता। 

Sunday, 7 April 2013

Creativity Crisis.

मैं क्यों लिखूँ
क्या लिखूँ
कैसे लिखूँ 
किसको लिखूँ  
कोई जवाब नहीं
फिर भी लिखने का मन है
बहुत असमंजस है

आखिर क्यूँ लिखना जरुरी है?
कौन सा मेरे लिखने से
पत्ते हिलने लगेंगे
हवायें  चलने लगेंगे
पंछी बादलों को चीरकर
मीठी नमकीन बूंदों
की बरसात करा देंगे ?
एक धेला भी फर्क नी  पड़ता
फिर भी है लिखने का मन करता


अगर मन की सुनूँ
लिखना भी चाहूँ
तो क्या लिखूं
ना कोई प्रेमिका है न प्यार है
दिमाग दिवालियेपन का शिकार है
प्रेरणादायी उक्तियाँ, मद्धुर लतीफे
या जिंदगी के मजादार किस्से
कुछ समझ नहीं आता
क्या व्यंग्य लिखूं राजनीती पे
की क्यूँ भागता भुत
अपनी लंगोटी नहीं बचा पता ?

पर फिर सोचता हूँ
की कुछ मिल भी जाये लिखने को
तो कैसे लिखूँगा
लेखन की कला से मेरी लेखनी
की कहाँ है कभी बनी
कैसे भूलूँ की
साहित्य के शिक्षक आज भी
मेरे सपनो में आते हैं
मेरी लिखावट व वाक्य संरचना
की खिल्ली उड़ाते हैं
मेरी मार्कशीट को मुझे दिखा
भैंस वाले मुहावरे सुनाते  हैं

किसको लिखूं ये समस्या उतनी बड़ी नहीं है
इसलिए मुझे भी इसकी कुछ खास पड़ी नहीं है
पर गर बाकी  प्रश्नों के हल मिल जाते
तो आपकी दुआ से
हम भी लेखक सफल बन जाते।।






















Thursday, 28 March 2013

द्वंद


तू रुक
इन्तजार कर
पहले ये तो कर
फिर वो कर
और उसका भी वक़्त आएगा

अभी क्या है तेरे पास
बस दो चार चवन्नी
तू बस अभी दुनिया के पीछे चलता चल
तुझे सपने देखने की इजाजत नहीं

तुझे दौड़ने की जरूरत नहीं
तू अभी पैर पे खड़ा होना तो सीख
तूझे न्याय-अन्याय की बात करने की इजाजत नहीं
सो तू मत बोल की ये  नहीं ठीक
तो वो  नहीं ठीक

तू बस अभी खुद को देख
कुछ पैसे बना
नाम कमा
अपनी आवाज बुलंद कर
तू भूल दुनिया को, हालातो पे तेरा वश नहीं
तू बस अपनी गाड़ी में
पेट्रोल भरा
पहिये दौड़ा
अपनी जिंदगी बसर कर

कोई जरूरत नहीं है
बड़ा सोचने की
बड़ा बोलने की
तू कोई विधाता नहीं जो दुनिया बदलेगा
तू स्वार्थी बन
तू लालची बन
तू बस वो बन जो
तू अभी बन सकता है
खुद को दुसरो से अलग मत समझ
मत सोच की
तू कुछ भी बदल सकता है

तू बस अभी खुद में रीन जा
खुद की सोच खुद को बना

तू रुक
इंतजार कर
पहले ये तो कर
फिर वो कर
और उसका भी वक़्त आएगा।।





Tuesday, 19 March 2013

चंद्रशेखर आजाद

चंद्रशेखर आजाद
हम चाहे उन्हें भूल भी जाये
पर नेता उन्हें जरूर याद करते हैं
उनके मूल्यों को संजोये रखने
की फरियाद करते हैं

उन्होंने न पकड़े जाने की कसम खाई थी
इन्होने न पकडे जाने की रस्म बनाई  है
बस फर्क इतना है की
एक में थी आजादी की धुन
दुसरे है बर्बादी के घुन






Tuesday, 5 March 2013

दोस्तों की महफ़िल

बेसुध करने वाले
मयखाने तो मिलते है बहुत
पर सिर्फ समां बांध मदहोश
करने वाले साक़ी
कहाँ रोज मिलते है ?

तरस जाते है दो बूंद ख़ुशी को
पर क्खुसी से सराबोर झुमने के
मौके कहाँरोज मिलते है ?

नाचने गाने को समय
और जगह दोनों मिल ही जाते है
पर असमय बरबस ही
पैर थिरकने लग जाये
ऐसे लम्हे कहाँ रोज मिलते है?

दोस्तों से मुलाकात तो
हो जाती है अक्सर
पर दोस्तों की महफ़िल कहाँ  रोज सजते है 

Sunday, 3 March 2013

तुम

तुम एक अबूझ पहेली हो
खुद में खोई रहती
खुद की सहेली हो
तुम्हे जानना चाहता हूँ
समझना चाहता हूँ
पर जितनी कोशिश करू
उतना ही उलझता जाता हूँ

कभी छुईमुई
कभी ज्वार भाटा
कभी नदी की सुरमयी संगीत हो
कभी गुस्साती
कभी हंसाती
कभी प्रिय मनमीत हो

अब और नहीं करता कोशिश
तुम्हे जानने की
शायद
तुम अब मुझे
पहेली की तरह ही पसंद हो।। 

Wednesday, 20 February 2013

एक और भगत सिंह


मेरे पडोसी तिवारी जी
लॉन में आराम से बैठे
चाय की चुस्की साथ
सुबह की अख़बार के मजे ले रहे थे

की अचानक उनके सुर बिगड़ गए
मुख से अपशब्दों की
नदी फुट पड़ी
जैसे किसी बन्दुक से हो
गोलियाँ बरस पड़ी

मैं अचंभित उनके पास गया
जैसे ही पूछा क्या हुआ?
अख़बार दिखाने  लगे

इतनी गन्दी, इतना भ्रष्टाचार
युवा बैठे बेरोजगार
महिलाओ के साथ अमानवीय व्यव्हार
बस अब और नहीं सहा जाता
नहीं होता इंतज़ार

एक और बलिदानी पैदा होना चाहिए
एक और भगत सिंह पैदा होना चाहिए
पर मेरे नहीं पडोसी के घर में

मैंने भी हामी में गर्दन हिलाया
कहा, सही कहते है आप
एक और भगत सिंह पैदा होना चाहिए
पर मेरे नहीं पडोसी के घर में

Sunday, 10 February 2013

एक अदद छात्र की याचना



हर परीक्षा में एक
नियम होना चाहिए
प्रश्न चाहे कैसे भी हो
निरीक्षिका सुन्दर होनी चाहिए

प्रश्न पत्र देखने के बाद
मन वैसे ही बैठ जाता है
छापा पुर्जा भी साथ नहीं देते
कलम भी रूठ जाता है

ऐसे में
कब तक बगले झाकेंगे
पुर्जे को टटोरेंगे
पेंसिल और तेज करेंगे
या सादी उत्तर-पुस्तिका निहारेंगे
आखिर कब तक?

कुछ समय बाद
सब निरर्थक लगता है
बैठे बैठे मन उबने
दिल डूबने सा लगता है
परीक्षा भवन, राष्ट्रिपति भवन सा
बड़ा, बिना प्रयोजन लगता है

ऐसे में , गर एक सुन्दर निरीक्षिका हो
आँख को सुकून मिल जायेगा
दिल को समझाने, को कुछ मिल जायेगा
परीक्षा भवन में रुकने का कारन मिल जायेगा

रुक के, एक दो प्रश्न तो टेप ही देंगे
कौन जाने, शायद कुछ अंक और मिल जाये
और बहाने हमारे अंकपत्र में
भी फेल के जगह पास छप जाये 

Sunday, 20 January 2013

अंतिम तारीख

मिश्रा जी,
सरपट दौड़े जा रहे हैं
पैर-हाथ एक दुसरे से
रेस लगा रहे हैआँखे सड़क पे गडाएबेतरतीब चले जा रहे हैसर पे जैसे कोई धून सवार है
बगल से अप्सरा गुजरतीया बदबू देती नाली-कालीइन्हें कोई सुध नहींबस कदम बढ़ा रहे हैसर पे जैसे कोई भूत सवार है
कल तक जो अपनी धोती कमीज पेछटास भर धुल नहीं पड़ने देते थेआज धुलिया गली मेंहोली मच रहे हैचेहरे पे रेखांये खिंची हैसर पे जैसे इनके मौत सवार है
नुक्कड़ पे पहुचे ही थेअचानक पीछे से किसी ने आवाज लगाईक्या बात हैराजधानी आज सड़क पे आई?
मिश्रा जी पीछे मुड़ेआँखे लाल, तनी भृकुटीचिल्ला कर बोलेमसखरी मत करोआज दिमाग नहीं ठीक हैदेर हो रही हैआज फारम भरने की अंतिम तारीख है.

अनमनी ज़िन्दगी


आज ज़िन्दगी को अपनी आँखों
के सामने गुजरते देखा 
कुछ मायूस लगी ज़िन्दगी 

रोती बिलखती नहीं पर 
संजीदगी से अपने गम को 
छुपाती और इशारो में
दर्द बयां करती ज़िन्दगी

अभी तक मैं रहा खुशफहमी में 
की मस्तमौला है अपनी ज़िन्दगी 
आज उदास सा लगता है 
देख यह बेतरतीब जिंदगी 

जाने किस रंग की आस 
कैसी मिठास 
किसके पास
जिसकी तलास में भटक रही है ज़िन्दगी

कुछ तो बता दो 
है अब किसका लिहाज 
की क्यों हो मायूस
ओ मेरी ज़िन्दगी?