Monday, 22 April 2013

तुम्हारी यादें

तुम समय-असमय
अनायास
आज भी याद आते हो
मुझे खींचते हो अपनी तरफ
किसी और ही
दुनिया में ले जाते हो

जहाँ सही गलत
कुछ नहीं
जहाँ झूठ सच का
ढोंग नहीं
जहाँ दगा नहीं
दर्द नहीं
बस मैं और तुम्हारी चटपटी यादें

कहानियाँ बुनता
किरदार गढ़ता
मैं खेलता घंटो
उनके साथ
जैसे यादें, यादें न हों 
कहानी हो रंगमंच की 
जहाँ मैं ही निर्देशक 
मैं ही कलाकार 

हर बार एक नया 
अंत लिखता
खुद को समझाता 
खुद समझता

तुम्हारी तरह 
तुम्हारी यादें भी 
एक अजीब पहली 
बन गयी हैं
पता नहीं क्या चाहती हैं 
न हंसने देती हैं न रोने 
हाँ कभी कभी हौले से गुदगुदा जाती हैं 
बिलकुल तुम्हारी तरह 



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