Wednesday, 20 February 2013

एक और भगत सिंह


मेरे पडोसी तिवारी जी
लॉन में आराम से बैठे
चाय की चुस्की साथ
सुबह की अख़बार के मजे ले रहे थे

की अचानक उनके सुर बिगड़ गए
मुख से अपशब्दों की
नदी फुट पड़ी
जैसे किसी बन्दुक से हो
गोलियाँ बरस पड़ी

मैं अचंभित उनके पास गया
जैसे ही पूछा क्या हुआ?
अख़बार दिखाने  लगे

इतनी गन्दी, इतना भ्रष्टाचार
युवा बैठे बेरोजगार
महिलाओ के साथ अमानवीय व्यव्हार
बस अब और नहीं सहा जाता
नहीं होता इंतज़ार

एक और बलिदानी पैदा होना चाहिए
एक और भगत सिंह पैदा होना चाहिए
पर मेरे नहीं पडोसी के घर में

मैंने भी हामी में गर्दन हिलाया
कहा, सही कहते है आप
एक और भगत सिंह पैदा होना चाहिए
पर मेरे नहीं पडोसी के घर में

Sunday, 10 February 2013

एक अदद छात्र की याचना



हर परीक्षा में एक
नियम होना चाहिए
प्रश्न चाहे कैसे भी हो
निरीक्षिका सुन्दर होनी चाहिए

प्रश्न पत्र देखने के बाद
मन वैसे ही बैठ जाता है
छापा पुर्जा भी साथ नहीं देते
कलम भी रूठ जाता है

ऐसे में
कब तक बगले झाकेंगे
पुर्जे को टटोरेंगे
पेंसिल और तेज करेंगे
या सादी उत्तर-पुस्तिका निहारेंगे
आखिर कब तक?

कुछ समय बाद
सब निरर्थक लगता है
बैठे बैठे मन उबने
दिल डूबने सा लगता है
परीक्षा भवन, राष्ट्रिपति भवन सा
बड़ा, बिना प्रयोजन लगता है

ऐसे में , गर एक सुन्दर निरीक्षिका हो
आँख को सुकून मिल जायेगा
दिल को समझाने, को कुछ मिल जायेगा
परीक्षा भवन में रुकने का कारन मिल जायेगा

रुक के, एक दो प्रश्न तो टेप ही देंगे
कौन जाने, शायद कुछ अंक और मिल जाये
और बहाने हमारे अंकपत्र में
भी फेल के जगह पास छप जाये