मेरे पडोसी तिवारी जी
लॉन में आराम से बैठे
चाय की चुस्की साथ
सुबह की अख़बार के मजे ले रहे थे
की अचानक उनके सुर बिगड़ गए
मुख से अपशब्दों की
नदी फुट पड़ी
जैसे किसी बन्दुक से हो
गोलियाँ बरस पड़ी
मैं अचंभित उनके पास गया
जैसे ही पूछा क्या हुआ?
अख़बार दिखाने लगे
इतनी गन्दी, इतना भ्रष्टाचार
युवा बैठे बेरोजगार
महिलाओ के साथ अमानवीय व्यव्हार
बस अब और नहीं सहा जाता
नहीं होता इंतज़ार
एक और बलिदानी पैदा होना चाहिए
एक और भगत सिंह पैदा होना चाहिए
पर मेरे नहीं पडोसी के घर में
मैंने भी हामी में गर्दन हिलाया
कहा, सही कहते है आप
एक और भगत सिंह पैदा होना चाहिए
पर मेरे नहीं पडोसी के घर में