Sunday, 23 June 2013

उन दोनों की लड़ाई

छोटी छोटी बातों   पे
यूँ बेमतलब का लड़ना 
रुसना, गुस्सा होना 
मुँह फुलाना 
नाक सिकोड़ना
चुटकी लेना 
फिर बातें बनाना 
माफ़ी मांगना 
गुदगुदाना, हँसना 
हँसाना 
साथ बैठ  घंटो कहानियाँ बाचना 
फिर कोई दुखड़ा सुनाना 
चुटकी लेना 
गुस्सा होना 
ये सिलसिला  चलता रहता है 
दोनों झगड़ते है 
एक दुसरे को मनाने के लिए 








उत्तराखंड से

हर जान की कीमत लगी
है इस दुकान में 
जिन्दा लोगो को भुना  
जाता है हमारे मकान में 

जो जितना गरीब मजबूर है 
उतना ही वो लजीज है 
रोटियों को उनके लाश पे 
पकाकर तो देखो 
आप एक बार आओ 
खाकर तो देखो 
नही स्वाद ऐसा किसी पकवान में

वैसे खाने से भी
ज्यादा मजा पकाने में है
एक एक बोटी को काटकर
तेल गर्म करते हैं
नमक मसाला मिलाकर जब छानते हैं
गर्म तेल में बोटी जो बुलबुले बनाता है
नजारा देख दिल को सुकून आता है
लगता है की
गर जन्नत कहीं है तो बस यहीं है

 -उत्तराखंड से

   

इंसानियत

इंसानों की इंसानियत देख
जानवर भी कहते होंगे
की अच्छा है की हम इंसान नहीं


Sunday, 16 June 2013

मेरी इंसानियत

वर्षो बाद दिखा आज
मैं तो उसे भूल भी चूका था
पता नहीं कैसे मिल गया आज

कपड़े  फटे थे
शरीर झुलसा हुआ
चेहरा झुर्रियो से लदा था
जीर्ण बिस्तर बिछाये
सड़क पे वो लेटा पड़ा था

बड़ी मुश्किल से पहचान पाया
उठाया उसे घर लाया
वो मेरी इंसानियत थी।



Thursday, 13 June 2013

कोरी दया जब तक भीख में दी जाएगी 
इंसानियत अपाहिज ही नजर आएगी 

यहाँ सभी कहते हैं दिल साफ़ है मेरा 
पर नियत किसी से दिखाई नहीं जाएगी 

गलियाँ तो सभी साफ़ देखना चाहते हैं 
पर झाड़ू किसी से नहीं उठाई जाएगी 

सिनेमा में खूब सीटियाँ तालियाँ बजेगी
ऐसे कभी हीरो के लिए आवाज नहीं आएगी 

जब तलक हलक से स्वर क्रांति फूटता नहीं 
हुक्मरानों को जम्हूरियत बेगम ही नजर आएगी 


Wednesday, 12 June 2013

पहली मुलाक़ात


हम अजनबी ही
तो थे कुछ दिन पहले
यूँ ही मिले  थे टहलते
हुए रास्तो पे
तुम्हे याद है ना?

तुमने वो रंग-बिरंगी
इन्द्रधनुषी मुस्कराहट
पहनी थी
मैं पक्की सड़क चेहरे
पे पहन जा रहा था
तुमने टोका था
तुम्हे याद है ना?

मैं कैसे आँधियों में
खड़े पेड़ सा
अनिश्चित
अपने भाग्य पे
इतरा रहा था
तुम्हे याद है ना?

कुछ ही दिन तो हुए हैं
पर कितनी पुरानी
बात लगती है
बहुत आगे निकल चुके हम
पर आज जब  मुहाने पे खड़े हैं
तब मैं एक बार फिर तुमसे
पहली बार मिलना चाहता हूँ


अलग इतिहास

बड़ी तमन्ना है मेरी
की अजूबा बनूँ, कुछ अलग करूँ।
अचानक दिमाग में आया
क्यूँ न अलग इतिहास लिखूँ
सही को गलत, झूठ को सच
मनगढ़ंत कहानियाँ बेबाक लिखूँ

बीरबल को बेवकूफ
अकबर को अक्लमंद
तानसेन को बेसुरा
मान-सिंह को दरबान लिखूँ

तथ्यों को मरोड़ दूँ
कुछ इधर से उधार
कुछ उधर से उधार
ले बस कहानियाँ जोड़ दूँ

सच का मुखौटा पहना
झूठ को पुरजोर लिखूँ
बड़ी तमन्ना हुई मेरी
की मैं अलग इतिहास लिखूँ

पर फिर  नजर मेज पे रखी
इतिहास की पुस्तको पे पड़ी
सच हैं कहा इनमे
सच का अल्पांश लिखा है
तंग हाथों से सबने
बस अपना अभिप्राय लिखा है
सच का चोला ओढ़ाकर
झूठ बेहिसाब लिखा है

अलग बनने की होड़ में
कहाँ बाज़ार में आ गया
आजकल फिर से बैठा सोच रहा हूँ
क्या करूँ क्या करूँ






Tuesday, 4 June 2013

Big Bang

शायद कहीं कुछ Big Bang सा हुआ है
सिद्धांतो का Democratic विचारो का
क्यूंकि एक  नया ही Universe जन्मा है
यहाँ Matters का नहीं
विचारो का  जोर है
बुनियादी हक़, पूर्ण स्वतंत्रता चाहिए
हर तरफ यही शोर है

ये Universe थोडा अलग है
यहाँ की Gravity  है Humanity
Dark Matters की
जगह Computers हैं
और इन्टरनेट है Dark Energy

Tunisia में Nebula दिख रहा
तो Turkey में Supernova
बन रहा, मिट रहा
है मिट के बन रहा

यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं
हर विचार गतिशील है
शायद कहीं कुछ Big Bang सा हुआ है