Thursday, 30 May 2013

कागजो का आकलन

चंद कागज के टुकड़े
कुछ अंक जैसे है
जिनमे छपे हुए
सालो पुरानी पद्धति
जिनके आकलन की
वो क्या खाक तुम्हारे
भविष्य का निर्माण-पतन करेंगे
जिनके प्रासंगिकता पे
खुद लाखो सवाल हैं उठते

ये अंक, आकलन की नहीं
बस प्रतिष्ठा की बानगी है
दिखाने के काम आती हैं
और किसी काम की नहीं है

हाँ यह रद्दी भी नहीं हैं, पर फिर भी

कागज हैं, इन्हें कागज ही रहने दो
जिंदगी न बनाओ
किसी को इन चंद कागजो में
समेटा नहीं जा सकता
खुद को इनका गुलाम न बनाओ।।




Friday, 24 May 2013

मौसम

भरी दुपहरी में
नंगे बदन
पसीने में तरबतर
दो जून की रोटी की
खातिर मजूरी करते
मजदुर से पूछो
की मौसम कैसा है
दावा करता हूँ
की वो हतप्रभ
एकटक देखते हुए
तुम्हे इतना ही कह पायेगा
की दो जून की रोटी
नसीब है आज
भूख की अट्टाहस
नही गूँजेगी आज
सो मौसम अच्छा है



Monday, 13 May 2013

तस्वीरे

तस्वीरे क्या हैं?
कहने को एक प्रति
कैमरे से खिंची हुई
पर गर सोचें तो 
तस्वीरे हैं

जिंदगी के रंग-बिरंगी
यादों की
जीवंत परछाईयाँ

जितनी पुरानी
गढ़ती उतनी कहानी
दिन ब दिन इसे चढ़ती जवानी
जैसे पुरानी शराब

कुछ खट्ठी कुछ मीठी
माँ के हाथों की
गुड्म्मा सरीखी
चटपटी यादों की गुल्लक

जब कभी नीरस लगे
तो गुदगुदाती है
समय-असमय तस्वीरे
भी हमें जीना सीखा जाती हैं।