Monday, 6 June 2016

खंडहर

मेरे घर के 
बगल की गली में
एक आलीशान घर 
हुआ करता था,
स्कूल जाने के
रास्ते में पड़ता था,
दरवाजे पे दो बिलायती
लम्बे चौड़े कुत्ते
हर आने जाने वाले को
गुर्रा कर देखते थें
क्या ठाठ होगा इनका
सोचा करता था।
हमेशा कोई लम्बी
गाड़ी लगी रहती थी
रस्ते पे
और शाम को तो
कभी कभी यूँ
गाड़ियों का ताँता
लगा होता था
एंटीक गाड़ियों की
कोई शोरूम हो जैसे ,
गाड़ियों से उतरते लोगो
के बदन पे सिल्कीदार
चमकते कड़क कपड़े
अभी न्यू का टैग हटाया
हो ऐसा मालूम पड़ते थें।
जेहन में ये
सारे विचार उमड़ रहे थे
उस जगह को देखकर,
एकदम वीरान, धुत्त शांत
आधे कटे पेड़ सा बस
एकटक देखता हुआ
खंडहर रह गया था
कुछ कुत्ते आज भी आते थे
बची हुई दीवाल से
छाँह लेने
पर कभी ये उतना
आलिशान भव्य होगा
इसका अंदाजा लगाना
नामुमकिन सा था।
खुद मैं देख हैरान था,
सोचा शायद हर चीज की एक
उम्र होती है।