Monday, 22 April 2013

तुम्हारी यादें

तुम समय-असमय
अनायास
आज भी याद आते हो
मुझे खींचते हो अपनी तरफ
किसी और ही
दुनिया में ले जाते हो

जहाँ सही गलत
कुछ नहीं
जहाँ झूठ सच का
ढोंग नहीं
जहाँ दगा नहीं
दर्द नहीं
बस मैं और तुम्हारी चटपटी यादें

कहानियाँ बुनता
किरदार गढ़ता
मैं खेलता घंटो
उनके साथ
जैसे यादें, यादें न हों 
कहानी हो रंगमंच की 
जहाँ मैं ही निर्देशक 
मैं ही कलाकार 

हर बार एक नया 
अंत लिखता
खुद को समझाता 
खुद समझता

तुम्हारी तरह 
तुम्हारी यादें भी 
एक अजीब पहली 
बन गयी हैं
पता नहीं क्या चाहती हैं 
न हंसने देती हैं न रोने 
हाँ कभी कभी हौले से गुदगुदा जाती हैं 
बिलकुल तुम्हारी तरह 



Sunday, 14 April 2013

माफ़ीनामा

अरविन्द
बहुत धोखे खाये  हैं
हमने इन चंद वर्षो के
इतिहास में
इज्जत करता हूँ तुम्हारी
पर क्या करूँ भरोसा
नहीं होता अब किसी पे
होशो-हवास में।।

तुम्हे निराश नहीं
करना चाहता
पर अभी हमसे
कुछ भी अपेक्षा करना
बेईमानी होगी  
अभी  कुछ दूर तुम्हे
ना सिर्फ अकेले चलना है
इन पथरीली रास्तो पे
कँटीली झाड़ियो से होकर
बल्कि हमारे लिए एक
सहज सुगम
सड़क भी बनानी होगी
अगुआ नहीं बना सकते
तुम्हे बस अच्छाई के कयास में
भरोसा नहीं होता अब किसी पे
होशो-हवास में।।

तुम्हे इंतेजार करना होगा
नहीं जानता कितने दिन
अंगुलियों पे मैंने घंटे गिनना
छोड़ दिया
फ़क़त इतना कह सकता हु
तेरे साथ नहीं
तो तेरे खिलाफ भी नहीं
पर अभी तेरे साथ नहीं खड़ा
हो सकता तेरे आवास में
भरोसा नहीं होता है अब किसी पे
होशो-हवास  में।









Friday, 12 April 2013

बाघा के देशभक्त

देशभक्ति उबाल मारता है
बाघा बॉर्डर पे, 
वहाँ हर रोज 
14, 15 अगस्त का 
माहौल होता है। 
खून में गर्मी 
गले में आवाज 
आवाज में तल्खी 
हौसले बुलंद 
मुर्दे में भी जान फूंक दे 
ऐसा कलोल होता है।
सारे देशभक्त मिलेंगे 
आपको वहां
हर बच्चा बूढ़ा 
युवा दिखता  है यहाँ 
देशभक्ति की पराकाष्ठा 
की परिभाषा 
हर रोज गढ़ी जाती है 
बच्चा बच्चा जिंदाबाद 
के जयघोष करता है 
क्षण भर को सब कोई 
खुद को भगत और बोस  समझता है

सही कहते हैं वो लोग
घृणा से बड़ा कोई प्रेरक नहीं
बाघा गवाह है की हमे नफ़रत
की जरूरत है
हम प्यार के काबिल नहीं

अपने देश में लाख बुराई  है
गरीबी है, भ्रष्टाचार है
नैतिकता नहीं देह व्यापार है
पर किसे फिक्र
हम तो बस खुश है इस बात से
की पडोसी की होती जगहंसाई है।

शर्म और हंसी आती है
ऐसे देशभक्तों पर
जो बस जयघोष कर
कर्तव्य निर्वाह करते हैं
कुछ खास फर्क नहीं ऐसे लोग
और राजनेताओ में
दोनों अपने स्वार्थ की खातिर
देशभक्ति का माखौल  करते हैं।











Thursday, 11 April 2013

विडंबना

भारतीय राजनीती की 
विडंबना देखते बनती है 
यहाँ कहने को दो पक्ष हैं 
अलग विचार है अलग सोच है 
पर हकीकत में ये सब प्रपंच हैं 

उदहारणतः 
भारतीय राजनीती के दो 
अहम् चेहरे 
पप्पू और फेंकू 
साहब फर्क इनमे 
खास नहीं दिखता 
गर एक अम्बानी का तो दूसरा 
टाटा का है चमचा 

खैर पप्पू से ये  अपेक्षित है 
वो बस पारिवारिक 
जिम्मेदारी निर्वाह रहे है 
इसलिए कॉरपोरेट के 
पैर दबा रहे हैं 

पर फेंकू तो सोशलिस्ट बने फिरते हैं 
बराबरी और सम्पूर्ण विकाश की 
बाते करते रहते हैं 
फिर गरीबो के तरफ उनका 
ध्यान क्यूँ नहीं जाता 
क्यूँ कॉरपोरेट के पिछलग्गू बन 
उनकी तरफदारी करते हैं 
नए रोजगारों  के बजाए 
नए अरबपति बनाने की 
योजना बुनते रहते हैं

चलो फिर भी हम क्या कर सकते हैं 
पप्पू देश के युवराज हैं 
तो फेंकू एक मात्र भविष्य 
बस एक कहावत याद आता है 
की खाई में गिरो या कुंवे में 
मौत  है अवश्य।।



Monday, 8 April 2013

सपने

मुझे हमेशा रही है
ऐसे यन्त्र की कल्पना
जिससे कर सकू रिकॉर्ड
अपना हर एक सपना

अभी लगता है जैसे
जिंदगी का
एक हिस्सा
कोई खास किस्सा
मुझसे अनजान है

सपना अधीर करता है
अमीर करता है
गरीब करता है
हँसता है  रोता है
कभी कभी जलील करता है

सपने में वो
दो तिन मंजिले फांद  जाना
सितारों के साथ
चाँद पे बैठ खाना खाना
मौत के डर  से वो
गाड़ियों  से भी तेज भाग जाना
उसके लिए कुछ कविताये लिखना
और सबको सुनाना
पापा को पॉलिटिक्स समझाना
तो कभी बिलकुल असहाय
मुश्किल से रेंग पाना

सुबह जब नींद
उन सपनो की
धुंधलाई-छितराई  यादो
के साथ खुलती है
थोड़ा  अनमना लगता है
सपनो की उन कहानियो
को पूरा करने की
इक  बैचैनी होती है
सपनो को यादो की तरह
सहेज कर रखने की तमन्ना
हर सुबह दुनी होती है।


Life in MS-Excel Style

काश जिंदगी के कामों
का भी एक Record  होता
Mistakes को Manually
Find  कर Correct करते
या फिर Filter का ही
कोई Option  होता
Find  all  and  Replace  है easy
काश editing  का Macro  बना होता

भई Pivot Table  में Customize
कर Problems  Specifically देखते
और Lost Data Easily Recover होता
काश जिंदगी के कामो का भी
एक Record होता। 

Sunday, 7 April 2013

Creativity Crisis.

मैं क्यों लिखूँ
क्या लिखूँ
कैसे लिखूँ 
किसको लिखूँ  
कोई जवाब नहीं
फिर भी लिखने का मन है
बहुत असमंजस है

आखिर क्यूँ लिखना जरुरी है?
कौन सा मेरे लिखने से
पत्ते हिलने लगेंगे
हवायें  चलने लगेंगे
पंछी बादलों को चीरकर
मीठी नमकीन बूंदों
की बरसात करा देंगे ?
एक धेला भी फर्क नी  पड़ता
फिर भी है लिखने का मन करता


अगर मन की सुनूँ
लिखना भी चाहूँ
तो क्या लिखूं
ना कोई प्रेमिका है न प्यार है
दिमाग दिवालियेपन का शिकार है
प्रेरणादायी उक्तियाँ, मद्धुर लतीफे
या जिंदगी के मजादार किस्से
कुछ समझ नहीं आता
क्या व्यंग्य लिखूं राजनीती पे
की क्यूँ भागता भुत
अपनी लंगोटी नहीं बचा पता ?

पर फिर सोचता हूँ
की कुछ मिल भी जाये लिखने को
तो कैसे लिखूँगा
लेखन की कला से मेरी लेखनी
की कहाँ है कभी बनी
कैसे भूलूँ की
साहित्य के शिक्षक आज भी
मेरे सपनो में आते हैं
मेरी लिखावट व वाक्य संरचना
की खिल्ली उड़ाते हैं
मेरी मार्कशीट को मुझे दिखा
भैंस वाले मुहावरे सुनाते  हैं

किसको लिखूं ये समस्या उतनी बड़ी नहीं है
इसलिए मुझे भी इसकी कुछ खास पड़ी नहीं है
पर गर बाकी  प्रश्नों के हल मिल जाते
तो आपकी दुआ से
हम भी लेखक सफल बन जाते।।