भारतीय राजनीती की
विडंबना देखते बनती है
यहाँ कहने को दो पक्ष हैं
अलग विचार है अलग सोच है
पर हकीकत में ये सब प्रपंच हैं
उदहारणतः
भारतीय राजनीती के दो
अहम् चेहरे
पप्पू और फेंकू
साहब फर्क इनमे
खास नहीं दिखता
गर एक अम्बानी का तो दूसरा
टाटा का है चमचा
खैर पप्पू से ये अपेक्षित है
वो बस पारिवारिक
जिम्मेदारी निर्वाह रहे है
इसलिए कॉरपोरेट के
पैर दबा रहे हैं
पर फेंकू तो सोशलिस्ट बने फिरते हैं
बराबरी और सम्पूर्ण विकाश की
बाते करते रहते हैं
फिर गरीबो के तरफ उनका
ध्यान क्यूँ नहीं जाता
क्यूँ कॉरपोरेट के पिछलग्गू बन
उनकी तरफदारी करते हैं
नए रोजगारों के बजाए
नए अरबपति बनाने की
योजना बुनते रहते हैं
चलो फिर भी हम क्या कर सकते हैं
पप्पू देश के युवराज हैं
तो फेंकू एक मात्र भविष्य
बस एक कहावत याद आता है
की खाई में गिरो या कुंवे में
मौत है अवश्य।।
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