Sunday, 7 April 2013

Creativity Crisis.

मैं क्यों लिखूँ
क्या लिखूँ
कैसे लिखूँ 
किसको लिखूँ  
कोई जवाब नहीं
फिर भी लिखने का मन है
बहुत असमंजस है

आखिर क्यूँ लिखना जरुरी है?
कौन सा मेरे लिखने से
पत्ते हिलने लगेंगे
हवायें  चलने लगेंगे
पंछी बादलों को चीरकर
मीठी नमकीन बूंदों
की बरसात करा देंगे ?
एक धेला भी फर्क नी  पड़ता
फिर भी है लिखने का मन करता


अगर मन की सुनूँ
लिखना भी चाहूँ
तो क्या लिखूं
ना कोई प्रेमिका है न प्यार है
दिमाग दिवालियेपन का शिकार है
प्रेरणादायी उक्तियाँ, मद्धुर लतीफे
या जिंदगी के मजादार किस्से
कुछ समझ नहीं आता
क्या व्यंग्य लिखूं राजनीती पे
की क्यूँ भागता भुत
अपनी लंगोटी नहीं बचा पता ?

पर फिर सोचता हूँ
की कुछ मिल भी जाये लिखने को
तो कैसे लिखूँगा
लेखन की कला से मेरी लेखनी
की कहाँ है कभी बनी
कैसे भूलूँ की
साहित्य के शिक्षक आज भी
मेरे सपनो में आते हैं
मेरी लिखावट व वाक्य संरचना
की खिल्ली उड़ाते हैं
मेरी मार्कशीट को मुझे दिखा
भैंस वाले मुहावरे सुनाते  हैं

किसको लिखूं ये समस्या उतनी बड़ी नहीं है
इसलिए मुझे भी इसकी कुछ खास पड़ी नहीं है
पर गर बाकी  प्रश्नों के हल मिल जाते
तो आपकी दुआ से
हम भी लेखक सफल बन जाते।।






















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