Monday, 8 April 2013

सपने

मुझे हमेशा रही है
ऐसे यन्त्र की कल्पना
जिससे कर सकू रिकॉर्ड
अपना हर एक सपना

अभी लगता है जैसे
जिंदगी का
एक हिस्सा
कोई खास किस्सा
मुझसे अनजान है

सपना अधीर करता है
अमीर करता है
गरीब करता है
हँसता है  रोता है
कभी कभी जलील करता है

सपने में वो
दो तिन मंजिले फांद  जाना
सितारों के साथ
चाँद पे बैठ खाना खाना
मौत के डर  से वो
गाड़ियों  से भी तेज भाग जाना
उसके लिए कुछ कविताये लिखना
और सबको सुनाना
पापा को पॉलिटिक्स समझाना
तो कभी बिलकुल असहाय
मुश्किल से रेंग पाना

सुबह जब नींद
उन सपनो की
धुंधलाई-छितराई  यादो
के साथ खुलती है
थोड़ा  अनमना लगता है
सपनो की उन कहानियो
को पूरा करने की
इक  बैचैनी होती है
सपनो को यादो की तरह
सहेज कर रखने की तमन्ना
हर सुबह दुनी होती है।


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