Sunday, 9 August 2015

अरस्तु

मैं घर पे बैठा बोर
हो रहा था, 
सोचा नुक्कड़ तक हो आऊं। 
थोड़ा घूम लूँ 
देख लूँ सबको 
फिर घर आ के सो जाऊं। 

ज्योंही चला
द्वार से निकला 
बाएं थे दो लोग, 
टीवी/मोबाइल कैसे ख़राब कर 
रही संस्कृति,
बच्चो को हिंसक 
महिलाओं की
है बदल रही प्रकृति ,
दे रहे थे जोर। 
मुझे उनकी बाते 
प्रेरणामय लगी ,
हाथ मुंह में धुंए लिए 
एकदम अरस्तु दिख रहे थे।