मैं घर पे बैठा बोर
ज्योंही चला
द्वार से निकला
हो रहा था,
सोचा नुक्कड़ तक हो आऊं।
थोड़ा घूम लूँ
देख लूँ सबको
फिर घर आ के सो जाऊं।
ज्योंही चला
द्वार से निकला
बाएं थे दो लोग,
टीवी/मोबाइल कैसे ख़राब कर
रही संस्कृति,
बच्चो को हिंसक
महिलाओं की
है बदल रही प्रकृति ,
दे रहे थे जोर।
मुझे उनकी बाते
प्रेरणामय लगी ,
हाथ मुंह में धुंए लिए
एकदम अरस्तु दिख रहे थे।
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