Tuesday, 5 March 2013

दोस्तों की महफ़िल

बेसुध करने वाले
मयखाने तो मिलते है बहुत
पर सिर्फ समां बांध मदहोश
करने वाले साक़ी
कहाँ रोज मिलते है ?

तरस जाते है दो बूंद ख़ुशी को
पर क्खुसी से सराबोर झुमने के
मौके कहाँरोज मिलते है ?

नाचने गाने को समय
और जगह दोनों मिल ही जाते है
पर असमय बरबस ही
पैर थिरकने लग जाये
ऐसे लम्हे कहाँ रोज मिलते है?

दोस्तों से मुलाकात तो
हो जाती है अक्सर
पर दोस्तों की महफ़िल कहाँ  रोज सजते है 

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