Sunday, 3 March 2013

तुम

तुम एक अबूझ पहेली हो
खुद में खोई रहती
खुद की सहेली हो
तुम्हे जानना चाहता हूँ
समझना चाहता हूँ
पर जितनी कोशिश करू
उतना ही उलझता जाता हूँ

कभी छुईमुई
कभी ज्वार भाटा
कभी नदी की सुरमयी संगीत हो
कभी गुस्साती
कभी हंसाती
कभी प्रिय मनमीत हो

अब और नहीं करता कोशिश
तुम्हे जानने की
शायद
तुम अब मुझे
पहेली की तरह ही पसंद हो।। 

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