तुम एक अबूझ पहेली हो
खुद में खोई रहती
खुद की सहेली हो
तुम्हे जानना चाहता हूँ
समझना चाहता हूँ
पर जितनी कोशिश करू
उतना ही उलझता जाता हूँ
कभी छुईमुई
कभी ज्वार भाटा
कभी नदी की सुरमयी संगीत हो
कभी गुस्साती
कभी हंसाती
कभी प्रिय मनमीत हो
अब और नहीं करता कोशिश
तुम्हे जानने की
शायद
तुम अब मुझे
पहेली की तरह ही पसंद हो।।
खुद में खोई रहती
खुद की सहेली हो
तुम्हे जानना चाहता हूँ
समझना चाहता हूँ
पर जितनी कोशिश करू
उतना ही उलझता जाता हूँ
कभी छुईमुई
कभी ज्वार भाटा
कभी नदी की सुरमयी संगीत हो
कभी गुस्साती
कभी हंसाती
कभी प्रिय मनमीत हो
अब और नहीं करता कोशिश
तुम्हे जानने की
शायद
तुम अब मुझे
पहेली की तरह ही पसंद हो।।
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