पहली बार जेल में
कैदी ज्यों ही खोलता है आँखे
उसे घुटन होती है बैरक में
छोटा सा पुराना बदबूदार बैरक
पसीने,पीक और पेशाब की ऐसी प्रगाढ़ता
मानो संगम हो इलाहाबाद का
उसपे भीड़, भीड़ कैदियों की
कपड़ो की
कंबलों की
चप्पलों की
बेतरतीब से फेंके हुए
पैर के ऊपर पैर
हाथ के ऊपर हाथ
बिलकुल 'मोहनजोदड़ो' लगती है बैरक
आँखे दिवालो में सुराख़ करना चाहती है
पैर सलाखें तोड़ दौड़ना चाहती हैं
और नाक खोद देना चाहती जमीं
सोंधी सी खुसबू को
बस
पहले कुछ दिनों तक।
फिर
सिपाही से दोस्ती
जेल राइटर से पहचान
साथी कैदियों से सम्मान
और आदत हो जाती है जेल की
हाँ पर मन में अभी भी
एक टीस एक ख़लिश रहती है
बड़े बैरक की
जहाँ इतनी भीड़ न हो
जहाँ इतनी गन्दगी न हो
जहाँ जेल इतनी जेल न हो
हाँ पर अब जेल बुरी नही लगती।
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