Monday, 20 January 2014

The Second Sex

तुम फूल नहीं हो
जो मुरझा झायेगी छूने पर
तुम उपहार नहीं हो
जिसे सम्भाल के रखा जाये
तुम ट्रॉफी नहीं हो ताक  पे रखी
किसी का वर्चस्व दिखाने को
तुम बस गरिमा नहीं हो
किसी के नाक की
तुम Muse नहीं हो
कवियों लेखकों चित्रकारों कि
तुम्हे सिर्फ अलंकारो में
उतारा नहीं जा सकता

यार
तुम हाड़-माँस प्यार रोष  से
बनी एक इंसान हो
तुम निडर  हो, तुम कठोर हो
तुम गलत हो, तुम सही हो
तुम बहुत कुछ हो
तुम कुछ नहीं हो
बाकि सब इंसानों कि तरह
विधाता हो अपने भाग्य की
तुम्हारी पहचान है अपनी





No comments:

Post a Comment